किसान प्रेम का सच
इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता है की कृषि न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था का प्राथमिक क्षेत्र है बल्कि भारत के लगभग ६७ करोर और उत्तर प्रदेश के १२.६ करोर लोगों के जीवन यापन का आधार भी है, उत्तर प्रदेश सहित भारत की अर्थव्यवस्था कृषि आधारित अर्थव्यवस्था है और किसान (छोटे, सीमान्त और भूमिहीन किसान) अर्थव्यवस्था की बुनियाद है पिछले कुछ वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया में सबसे तेजी से तरक्की करने वाली अर्थव्यवस्थाओं में मानी जाती है, लेकिन आर्थिक तरक्की के आंकड़े गवाह है की यह पूरी तरह कृषि विकास दर पर निर्भर है. प्रदेश में लगभग २.५ करोर किसान है और ९० प्रतिशत से ज्यादा क्रियात्मक जोते लघु और सीमान्त किसान है. प्रदेश के लघु सीमान्त और भूमिहीन किसानों ने ही उत्तर प्रदेश की खाद्यान्न संपन्नता को बनाया है . और अन्न के कुल उत्पादन में भी खासा योगदान देते हैं लेकिन सर्वाधिक विपन्नों की श्रेणी में आते हैं, इस सम्बन्ध में स्थाई कृषि विकास के मुद्दे पर पिछले २० वर्षो से कार्यरत डॉ. सिराज अ वजीह का कहना है की “स्थायी कृषि की सफलता को प्राप्त करने के लिए राज्यों को किसान सम्यक कृषि नीति बनाना होगा”. पूरी दुनिया में जीन संशोधित बीजों के स्वस्थ्य, पर्यावरण और जैवविविधता पर पड़ने वाले खतरों पर भी चिंता की जा रही है पर उत्तर प्रदेश सहित देश के कई हिस्सों में इस तरह के बीजों का प्रयोग जरी है. दरासल इस तरह के बीज भारतीय किसान की सम्प्रभुता को समाप्त कर उसे गुलाम बना सकते हैं और बीज पर से किसान के परंपरागत और बुनियादी अधिकार को समाप्त कर सकते हैं.
पूर्वी उत्तर प्रदेश में बहुत बड़ी संख्या में महिलाएं कृषी कार्य में संलिप्त हैं। एक अनुमान के अनुसार बुवाई से लेकर भण्डारण तक उनका योगदान ७० से लेकर ८० प्रतिसत तक रहा है। महिला किसानों को खेतिहर मजदूरों के अत्यन्त योगदान के बावजूद भी उन्हें किसान के रूप में मान्यता नहीं मिली है और आज भी खेती में उन्हें पुरुष के सहायक रूप में ही पहचान मिली है और खेती से जुडाव के सारी औपचारिक रास्ते पुरुषों के माध्यम से होकर गुजरते है। कृषि संबंधी तकनीकों के विस्तार हों व सूच्नानो और जानकारियों को पहुचने की व्य्वैस्थाए, कार्य बोझ को कम करने के प्रयास हों या भोजन, फसल के चुनाव के निनारी, जमीनों पर हकदारी हो या बाजार हरे क क्षेत्र में कृषि महिला को वन्छ्त तरजीह नही डी गई और उन्हें हाशिया पर ही रखा जाता रहा, महिलाओ के कृषि क्षेत्र में योगदान के द्रिशोकं से देखा जाए तो यह कहना बिल्कुल भी ग़लत नहीं होगा की भारतीय कृषक का वास्तविक चेहरा एक महिला क है. भारतीय महिलाए कृषि का एक महेत्पूर्ण आधार है न की एक मात्र सहायक. कृषि कार्यों में वह अपना साथक योगदान सदैव से प्रस्तुत करती ई है. ये समस्त तथ्य महिला क्रशको के पक्ष में है पान्तु यथाथ्र से कोशों दूर है. महिलाओ के श्रम तथा प्रयाशों को एक कृषक के रूप में कभी भी मूल्यांकित नहीं किया जाता. यह असंतुलन महिला कृषकों को, उनके अधिकारों तथा नियंत्रण को काफी सार्थक रूप से परभावित करता है कृषि नीती में अवश्यक अमूल चूल परित्वत्सं परदेस में लगभग ८० प्रतिसत से ज्यादा लघु और सीमान्त कृषक है जो अपनी आजीविका हेतु कृषि पर निभर है अन्तः यह आवस्यकता बन जाती है इनके हित में कदम उठाये जाए जिससे कृषि विविधीकर्ण को बधवा मिले, उ.प. में खाद प्रस्नास्क्र्ण एवं गैर कृषि गतिविधियों के स्मवेसा की अपर संभावनाए है जिसके लिए अव्सेथाप्नात्मक आधार का विकेंद्रीकर्ण जरूर्व्व है, किसानों की प्रर्कातिक आपदाओं से होने वाली हानियाँ को कम करने हेतु प्रीस्थित के अनुकूल फसलों को विकास एवं प्रसार करना आवश्यक है, किसानो के आव्स्यक्ताओं की पूर्ति करने वाले उचित प्रसार तंत्रों की समुचित व्यवस्था की जानी चाहिए, समुचित जानकारियों को प्रचार-प्रसार एवं सेवा में सुधर करते हुए फसल बीमा योजना का आतिसीघ्र किर्यन्याँ किया जन चाहिए, एकल फसल, अनुयुक्त फसल, प्रतियों इस्थानीय क्षेत्र को ध्यान में रखते हुए रासायनिक खाद्यों के प्रयोग को बढावा न दिया जाए , इन समस्त मांगो को लेकर हल ही में उत्तर परदेस के विभिन्न जनपदों में करीब ५००० लघु और सीमान्त कृषक ने पैदल मार्च का आयोजन किया था, इस मार्च में परदेस में कृषकों से संबधित व्याप्त कुछ इथानीय मुद्दे भी उठाये गए थे,
भारत एक सांस्कृतिक विरासत वाला देसा रहा है कृषि भी हमें सांस्कृतिक विरासत के रूप में मिली है और शायद आज कृषी रूपी सांस्कृतिक विरासत भारत के लोगो की आजीविका का सबसे बड़ा साधन है इसलिय हमें इस विरासत को जिन्दा रखना ही होगा। यह बड़ा दुभाग्य का विषय है की किसान जिसको हम अन्नदाता मानते हैं उसकी मोत हो रही है। आज भी नीतियां किसानों के हित में बनाईं जा रही हैं वह वास्तव में महज एक छलावा है किसानों के लिए क्योंकि यह प्रलोभनकारी नीतियां पूरीतरह से औघोगिक कंपनियों के हितों को देखकर बनायी जाती हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात निश्चय ही बड़ी- बड़ी उपलब्धियां हासिल की गई हैं यह उपलब्धियां महज औघोगिक उपलब्धियां तक सीमित है, वास्तव में हम जब इन उपलब्धियां में एक बार आम जनता और किसानो के खुशियों को देखते हैं तो उनके हिस्से में आंसू ज्यादा नजर आते हैं. अपने प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता के लिए भारत को सोने की चिडिया का देश कहा जाता हैं न की बडी- बडी औद्योगिक
कम्पनियों द्वारा शोषण किया जाना है जोकि न केवल कृषि के लिए चिंता का विषय है बल्कि पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है. किसान ही देश की आत्मा है यदि आत्मा ही बीमार हो जाए तो शरीर और मन कैसे स्वस्थ्य रहेगा, इसके लिए जरूरी है की किसान समृध्द हो ।
